Shri Shiva Mahimna Stotra Shloka 1

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Shri Shiva Mahimna Stotra Shloka 1
Shri Shiva Mahimna Stotra with meaning

श्री शिवमहिम्न स्तोत्र श्लोक १
स्वामी मधुसूदन सरस्वती संस्कृत टिका

भाषांतर – कर्दम ऋषि

शिवका अपार महिमा –
गुणोंका वर्णन करना इसे स्तुति कहते है। वह गुण वर्णन गुण को जाने बिगर करना शक्य नहीं है। जिसकी स्तुति करनी हो उसके गुणोंका ही ज्ञान न हो तो उसका वर्णन कैसे हो सकता है? भगवानके गुण अनंत और असंख्य है। उन गुणों का सच्चा ज्ञान किसीकोभी हो सके ऐसा नहीं है फिर परमात्मा की गुणवर्णन रूप स्तुति कैसे की जाय? दूसरा अशक्य और अयोग्य कार्य प्रारम्भ करनेसे हास्य होता है, यह प्रसिद्ध है। ऐसी किसीको शंका हो उसे दूर करने निमित्तसे स्वतः की विनयशीलता दिखाकर गंधर्वराज भगवान की स्तुति करना आरम्भ करते है –

महिम्न: पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी
स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिर:।
अथावाच्य: सर्व: स्वमतिपरिणामावधि गृणन्
ममाप्येष: स्तोत्रे हर ! निरपवाद: परिकर:।।१।।

भावार्थ – हे महादेव ! अगर आपके महिमा की परम सीमा जो न जाननेवालेकी (मेरी) स्तुति अयोग्य ठहरे, तो ब्रह्मादि देवो की वाणी भी आपके बारे में अयोग्य ही गिनी जायगी; और अगर अपनी अपनी बुद्धि की मर्यादासे स्तुति करनेवाले सर्व कोई निंदा पात्र न हो, तो मेरा भी यह स्तोत्र के लिये किया गया प्रयत्न निर्दोष अर्थात् योग्य ही है।।१।।

टिका – हे महादेव! आप भक्तों के दुःख हरनारे है, इसलिये आपका ‘हर’ नाम योग्य ही है। आप सभीके दुःख हरनारे है अतः आप मेरे भी दुःख अनायास ही दूर कर देंगे। (मुज पर कृपा करने के लिए आपको विशेष श्रम होने वाला नहीं) ऐसा यहाँ भाव है। हे प्रभो आपतो अनंत महिमा वाले है। ‘ आपका महिमा ऐसा है, इतना है’ ऐसा न जाननेवाला (मेरे जैसा) कोई आपकी स्तुति करे तो वह अयोग्य ठहरेगी। लेकिन सर्वज्ञ ऐसे सुप्रसिद्ध पाये हुये ब्रह्मादि देवो ने की हुई आपजी स्तुति भी अयोग्य ठहरेगी; क्योंकि वह भी आपके महिमा का पार नहीं पा सकते। यहाँ कोई शंका करेकी ब्रह्मादि देवगण तो सर्वज्ञ है, फिरभी वह महिमा का पार नहीं पा सकते ऐसा कहना अघटित है; तो उसके समाधान के लिए आकाश का उदहारण बस होगा। जैसे आकाश का पार, मर्यादा, छोर या अंत – ऐसा कुछ भी नहीं, इसलिए वह अनंत कहलाता है, वैसे ही ईश्वरका महिमा अनंत है; उसका पार, हद्द या कोई छोर नहीं है। ऐसे ही जिसका पार या छोर जैसी कोई वस्तु ही नहीं तो उसे जानना भी कैसे संभव है? जिसकी संभावना हो उस वस्तु के बारेमे कुछ जानना शक्य हो सकता है; परंतु मूल में जिसकी संभावना ही नहीं, उसके बारेमे जानना भी क्या हो? ऐसे ही ब्रह्मादि देव सर्वज्ञ हो कर भी ईश्वर की महिमा का पार नहीं पा सकते तो उससे उनकी सर्वज्ञतामे कुछ बाधा नहीं होती ऐसा सिद्ध हुआ और साथ साथ यह भी सिद्ध हुआ की ईश्वरके अनंत महिमा का पार कोई भी नहीं पा सकता। ‘नभः पतन्त्यात्मसमं पतत्रिण:’। पक्षी अपनी अपनी शक्ति अनुसार आकाशमें उड़ते है, कोई थोड़े ऊँचे जाते है तो कोई ज्यादा ऊँचे जाते है लेकिन आकाशका पार तो कोई नहीं पा सकता’ वैसे में भी, मुझे जितना ज्ञान है उस प्रमाण में वर्णन कर करपाउंगा और मुझसे विशेष ज्ञान वाला कोई होगा तो वह विशेष वर्णन कर पायेगा; परंतु आपके महिमा का पार कोई भी नहीं पा सकता। जिस वजह से स्तोत्र के विषय में मेरा किया गया प्रयत्न दोषित नहीं ठहरता।

इस तरह इस श्लोक के पूर्वार्ध में ईश्वर का महिमा अनंत है ऐसा वर्णित है और उत्तरार्ध में स्तुति के बारे में (यह अशक्य कार्य प्रारम्भ करनेसे हांसीपात्र तो नहीं हो जाऊँगा? ऐसी) आयी हुई शंकाका समाधान कर, अपनी अपनी शक्ति अनुसार की हुई स्तुति योग्य ही है, ऐसा दिखलाने में स्तोत्रकार की बड़ी कुशलता मालूम पड़ रही है।

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