श्रीविद्या साधना सरणि भाग 1

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श्रीविद्या साधना सरणि भाग 1

‘सर्वं शक्तिमजीजनत्’ ~ इस वेदवाक्यके अनुसार समस्त विश्व ही शक्तिसे उत्पन्न है। शक्तिके द्वारा ही अनंत ब्रह्मांडोंका पालन, पोषण और संहारादि होता है। ब्रह्म, शंकर, विष्णु, अग्नि, सूर्य, वरुण आदि देव भी उसी शक्तिसे संपन्न होकर स्व स्वकार्य करनेमें सक्षम होते हैं । प्रत्यक्षरूपसे सब कार्योंकी कारणरूपा भगवती ही है ~
शक्ति: करोति ब्रह्माण्डं सा वै पालयते$खिलम्।
इच्छया संहरत्येषा जगदेतच्चराचरम्।।
न विष्णुर्न हर: शक्रो न ब्रह्मा न च पावक:।
न सूर्यो वरुण: शक्त: स्वे स्वे कार्ये कथंचन।
तया युक्ता हि कुर्वन्ति स्वानि कार्याणि ते सूरा:।।
कारणं सैव कार्येषु प्रत्यक्षेणावगम्यते।।
(देवीभागवत)

अत: समस्त साधनाओंका मूलभूत शक्ति~उपासनाका क्रम आदिकालसे चला आ रहा है । स्वर्गादिनिवासि देवगण एवं ब्रह्मविद्वरिष्ठ ऋषि~महर्षियोंने भी शक्ति उपासनके बलसे अनेक लोक कल्याणकारी विलक्षण कार्य किये हैं। इनमें सर्व श्रेष्ठ स्थान है श्रीविद्या साधनाका । भारतवर्षकी यह परम रहस्यमयी सर्वोत्कृष्ट साधना प्रणाली मानी जाती है । ज्ञान, भक्ति, योग, कर्म आदि समस्त साधना प्रणालियोंका समुच्चय ही श्रीविद्या है । ईश्वरके नि:श्वासभूत होनेसे वेदोंकी प्रमाणिकता है। अत: सूत्ररूपसे वेदोंमें एवं विशद रूपसे तंत्र शास्त्रोंमें श्रीविद्या साधनाके क्रमाका विवेचन है । शिवप्रोक्त चौसठ वाममार्गीय तंत्रोंमें ऐहिक सिद्धियोंकी प्राप्तिके लिए विविध साधनाओंका वर्णन है । श्रीविद्या धर्म, अर्थ, काम इन तीन पुरुषार्थोंसहित परम पुरुषार्थ मोक्षको भी देनेवाली है ।
श्रीविद्याका स्वरुप ~
सांसारिक सकल कामनाओंके साधक चतु:षष्टीतंत्रोंका प्रतिपादन कर देनेके बाद पराम्बा भगवती पार्वतीने भूतभावन विश्वनाथसे पूछा ~’ भगवन् ! इन तंत्रोंकी साधनासे जीवके आधि व्याधि, शोक संताप, दीनता हीनता आदि क्लेश तो दूर हो जाएंगे, किन्तु गर्भवास और मरणके असह्य दुःखोंकी निवृत्ति या मोक्षरूप परमपदकी प्राप्तिका भी कोई उपाय बताइये।’ परम कल्याणमयी पुत्रवत्सला पराम्बाके साग्रह अनुरोधपर भगवान् शंकरने इस श्रीविद्यासाधना प्रणालीका प्राकट्य किया । इसी प्रसंगको आचार्य शंकर भगवत्पाद ‘ सौंदर्य लहरी’ में इन शब्दोंमें प्रकट करते है~

चतु:षष्टया तंत्रै: सकलमति संधाय भुवनं
स्थितस्तत्तत्सिद्धिप्रसव परतंत्रै: पशुपति:।
पुनस्त्वन्निर्बन्धादखिलपुरुषार्थैकघटना
स्वतंत्रं ते तन्त्रं क्षितितलमवातीतरदिदम्।।

‘ पशुपति भगवान् शंकर वाममार्गके चौसठ तंत्रोके द्वारा साधकोंकी जो जो स्वाभिमत सिद्धि है, उन सबका वर्णन कर शांतभो गये। फिर भी भगवती! आपके निर्बन्ध अर्थात् आग्रहपर उन्होंने सकल पुरुषार्थों अर्थात् धर्म, अर्थ, काम, मोक्षको प्रदान करनेवाले इन श्रीविद्या साधना तंत्रका प्राकट्य किया ।’

श्रीमत् शंकराचार्य ‘सौन्दर्यलहरी’ (श्लोक 101) में मन्त्र यंत्र आदि साधना प्रणालीका वर्णन करते हुए इस श्रीविद्या साधनाकी फल श्रुति लिखते है ~

सरस्वत्या लक्ष्म्या विधिहरिसपत्नो विहरते
रते: पातिव्रत्यम् शिथिलयति रम्येण वपुषा।
चिरं जीवन्नेव क्षपितपशुपाशव्यतिकर:
परानंदाभिख्यं रसयति रसं त्वद्भजनवान।।
‘ देवी ललिते ! आपका भजन करनेवाला साधक विद्याओंके ज्ञानसे विद्यापतित्व एवं विष्णुके लीये ‘ सपत्न ‘ अर्थात् अपरपति ~ प्रयुक्त असूयाका जनक हो जाता है। वह अपने सौन्दर्यशाली शरीरसे रतिपति कामको भी तिरस्कृत करता है एवं चिरञ्जीवी होकर पशु~पाशोंसे मुक्त जीवनमुक्त अवस्थाको प्राप्त होकर ‘ परानन्द ‘ नामक रसका पान करता है ।’

क्रमश:
जय अम्बे जय गुरुदेव।
श्रीमातस्त्रिपुरे मामव सुखसारे।

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